आरटीआई और औपचारिक शिकायत के बाद बढ़ी जांच की मांग, टेंडर–भुगतान प्रक्रिया घेरे में
मझौली जबलपुर
मझौली नगर परिषद में विगत दो वर्षों के दौरान कराए गए निर्माण कार्य अब सार्वजनिक बहस का विषय बन चुके हैं। भवन निर्माण, नाली, सीसी रोड, आंगनबाड़ी केंद्र एवं सामुदायिक भवन जैसे विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं को लेकर स्थानीय नागरिकों ने सूचना का अधिकार (RTI) के तहत विस्तृत जानकारी मांगी है और जिला प्रशासन के समक्ष औपचारिक शिकायत भी प्रस्तुत की है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, नगर परिषद द्वारा स्वीकृत कार्यों में निविदा प्रक्रिया, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान प्रणाली को लेकर शंकाएं व्यक्त की गई हैं। शिकायतकर्ताओं ने विशेष रूप से वार्ड पार्षद के परिवार द्वारा कराए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा है कि कुछ ठेकों के आवंटन में प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि शेष है, लेकिन अभिलेखों की मांग ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
आरटीआई आवेदन में पिछले दो वर्षों के सभी निर्माण कार्यों की सूची, निविदा प्रकाशन की प्रतियां, चयनित ठेकेदारों का विवरण, तकनीकी स्वीकृति पत्र, मापन पुस्तिका (MB) प्रविष्टियां, भुगतान वाउचर और पूर्णता प्रमाण पत्र की प्रतियां मांगी गई हैं। साथ ही, यह भी पूछा गया है कि क्या किसी जनप्रतिनिधि या उनके परिवार से संबंधित व्यक्ति/फर्म को कार्य आवंटित किए गए हैं।
शिकायत पत्र में यह तर्क दिया गया है कि यदि निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई या नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो यह मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 तथा राज्य के भंडार क्रय नियमों के विरुद्ध हो सकता है। इसके अलावा, गंभीर स्थिति में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) के तहत भी जांच की मांग की गई है।
सूत्रों का कहना है कि परिषद में पदस्थ इंजीनियर और मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, क्योंकि तकनीकी स्वीकृतियों और भुगतान अनुमोदन की अंतिम जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। हालांकि, संबंधित अधिकारियों की ओर से अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
जिला प्रशासन से की गई शिकायत में स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराने की मांग की गई है। साथ ही, लोकायुक्त स्तर पर भी प्राथमिक जांच दर्ज करने की बात कही गई है, ताकि यदि कोई अनियमितता हो तो तथ्य सामने आ सकें।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विकास कार्यों पर खर्च होने वाला प्रत्येक रुपया सार्वजनिक धन है और उसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है। यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो अभिलेख सार्वजनिक कर संदेह दूर किया जा सकता है। वहीं, यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी पाई जाती है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह मामला अब केवल निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन गया है। आरटीआई और औपचारिक शिकायत के बाद निगाहें अब जिला प्रशासन और जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में अभिलेखों का खुलासा और संभावित जांच इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेगी।
जनता की अपेक्षा स्पष्ट है — या तो आरोप निराधार साबित हों, या फिर जिम्मेदारी तय हो। पारदर्शिता ही विश्वास की नींव है, और मझौली में वही सबसे बड़ा प्रश्न बन चुकी है।




