प्रथम अपीलीय अधिकारी ने आवेदन लेने से किया इंकार, आवेदक अब राज्य सूचना आयोग की शरण में
मझौली (जबलपुर)
सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) 2005, जिसे सरकार ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए बनाया था, मझौली वन विभाग में दम तोड़ता नजर आ रहा है। यहाँ एक जिम्मेदार अधिकारी द्वारा RTI आवेदन स्वीकार करने से साफ इंकार करने का गंभीर मामला प्रकाश में आया है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, आवेदक शिवम साहू ने वन विभाग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दिया था। तय समय सीमा में जानकारी न मिलने पर, जब आवेदक नियमानुसार अपनी प्रथम अपील प्रस्तुत करने विभाग के ‘प्रथम अपीलीय अधिकारी’ के पास पहुँचे, तो अधिकारी ने आवेदन लेने से ही मना कर दिया।
नियमों की सरेआम अवहेलना
आवेदक शिवम साहू का आरोप है कि अधिकारी का यह व्यवहार सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6, 7 और 19 का खुला उल्लंघन है। कानून के मुताबिक, कोई भी लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय अधिकारी वैध आवेदन लेने से मना नहीं कर सकता।
“अधिकारी का आवेदन न लेना यह दर्शाता है कि विभाग के भीतर कुछ ऐसा है जिसे छिपाने की कोशिश की जा रही है। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि आम नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी है।” — शिवम साहू (आवेदक)
उठ रहे हैं गंभीर सवाल
वन विभाग की इस कार्यप्रणाली ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
* क्या विभाग के पास छिपाने के लिए कोई बड़ी अनिमितता है?
* क्या मझौली वन विभाग में सूचना के अधिकार का कानून लागू नहीं होता?
* उच्च अधिकारी इस प्रकार की मनमानी पर मौन क्यों हैं?
आगे की रणनीति
इस घटना के बाद अब आवेदक ने हार न मानते हुए मामले की शिकायत राज्य सूचना आयोग में करने की तैयारी कर ली है। यदि आयोग इस मामले में कड़ा संज्ञान लेता है, तो संबंधित अधिकारी पर भारी जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है।
अब देखना यह होगा कि क्या शासन-प्रशासन ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर नकेल कसता है या सूचना का अधिकार इसी तरह रद्दी के टुकड़े में तब्दील होता रहेगा।
रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज़ डेस्क




