“जान है तो जहान है” सिर्फ नारा नहीं, सवाल है व्यवस्था का
नई दिल्ली
राज्यसभा में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उठी आवाज़ ने देश को आईना दिखा दिया है। सांसद राघव चड्ढा ने सरकार के ही लक्ष्य को सामने रखते हुए कड़वा सच रखा—जब सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च GDP का 2.5% होना चाहिए, तब 2026 में भी भारत महज़ 0.5% पर अटका है। सवाल सीधा है: 140 करोड़ की आबादी की जान की कीमत क्या इतनी ही है?
तुलना और भी डरावनी है। अमेरिका 18%, यूके 12% और जर्मनी 13% GDP स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वस्थ नागरिक ही मज़बूत देश बनाते हैं।
भारत में बजट की कंजूसी का खामियाज़ा सरकारी अस्पताल भुगत रहे हैं—जर्जर इमारतें, डॉक्टरों-कर्मचारियों की भारी कमी, मशीनें-दवाइयाँ नदारद और बिस्तरों का अभाव। ऑपरेशन की तारीख़ इतनी दूर कि कई मरीज़ इंतज़ार में दम तोड़ देते हैं।
यह बहस सिर्फ़ आंकड़ों की नहीं, जिंदगियों की है। जब तक स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं बनेगा, विकास के दावे खोखले रहेंगे।
सवाल जनता से है—टैक्स देने के बाद भी क्या हमें इलाज का हक़ मिल रहा है?




