पशुपालन उपसंचालक और अस्पताल प्रभारी कटघरे में
मझौली/जबलपुर।
शासकीय पशु चिकित्सालय में कुत्तों के लिए रेबीज और पिस्सू नियंत्रण जैसी जीवनरक्षक दवाओं का पूरी तरह अभाव अब केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से खुला अपराध बनता जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब रेबीज जैसी घातक बीमारी सीधे इंसानों की जान से जुड़ी है, तो दवाएं खत्म होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
पशुपालन विभाग के उपसंचालक क्या जिले में दवा आपूर्ति की मॉनिटरिंग कर रहे हैं या सिर्फ कागजों में सब कुछ “उपलब्ध” दिखाया जा रहा है?
शासकीय पशु चिकित्सालय प्रभारी ने दवाएं खत्म होने की सूचना समय रहते वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों नहीं दी?
जिला प्रशासन और CMHO कार्यालय को क्या इस गंभीर खतरे की जानकारी है, या फिर किसी मौत के बाद ही फाइल खुलेगी?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि महीनों से अस्पताल में केवल “दवा नहीं है” का रटा-रटाया जवाब दिया जा रहा है। मजबूरन लोगों को निजी क्लीनिकों में हजारों रुपये खर्च कर वैक्सीन लगवानी पड़ रही है। सवाल उठता है—क्या शासकीय अस्पताल आम जनता के लिए हैं या सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड भरने के लिए यदि किसी बच्चे या नागरिक को कुत्ता काट ले और समय पर रेबीज वैक्सीन न मिले, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—अस्पताल प्रभारी, पशुपालन विभाग, या जिला प्रशासन?
अब जनता जवाब नहीं, तत्काल दवा आपूर्ति और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई चाहती है।




