निजाम बदला, मिजाज बदला”… महंगी किताबों के बोझ तले दबे अभिभावकों के समर्थन में उतरे पूर्व मंत्री


जबलपुर |
शिक्षा सत्र की शुरुआत होते ही जबलपुर में किताबों और कॉपियों की कीमतों ने आग लगा दी है। लेकिन इस बार यह आग केवल अभिभावकों की जेब तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजनीति के गलियारों तक पहुँच गई है। पाटन विधानसभा के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री अजय विश्नोई ने अपनी ही सरकार के प्रशासनिक रवैये पर एक ऐसा तंज कसा है जिसने पूरे जिले में खलबली मचा दी है।
विश्नोई ने दो टूक शब्दों में कहा— “निजाम बदला, मिजाज बदला।”
दीपक सक्सेना के दौर की याद और वर्तमान पर प्रहार
अजय विश्नोई ने सोशल मीडिया पर साल 2024 के उस दौर की याद दिलाई, जब तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना ने निजी स्कूलों और पुस्तक माफियाओं के गठजोड़ पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। उन्होंने कहा कि उस समय प्रशासन के सख्त रुख के कारण पुस्तक मेले अभिभावकों के लिए ‘राहत’ का केंद्र बने थे।
लेकिन आज के हालात पर उन्होंने सवाल उठाया: क्या वर्तमान प्रशासन की ढील ने विक्रेताओं के हौसले फिर से बुलंद कर दिए हैं? क्यों किताबों के सेट आज भी मनमाने दामों पर बेचे जा रहे हैं? प्रशासन की ‘उदासीनता’ का खामियाजा गरीब और मध्यमवर्गीय अभिभावक क्यों भुगतें?
पुस्तक मेले में दी जा रही छूट पर अजय विश्नोई ने तकनीकी और तार्किक प्रहार किया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मेले में केवल कॉपियों (नोटबुक) पर 60% की छूट दिखाकर वाहवाही लूटी जा रही है।
“कॉपियों की वास्तविक लागत उनके प्रिंट रेट से आधे से भी कम होती है। ऐसे में 60% की छूट देना कोई बड़ी राहत नहीं, बल्कि एक व्यापारिक चतुराई है। असली सवाल तो किताबों के दामों पर है, जहाँ कोई बड़ी राहत गायब है।” — अजय विश्नोई
अभिभावकों में पनप रहे आक्रोश को आवाज देते हुए इस लेख में प्रशासन की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया गया है।
मिलीभगत की आशंका: क्या स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच का सिंडिकेट फिर से सक्रिय हो गया है?
* कार्रवाई का अभाव: जब पिछले साल सख्त नियम लागू हो सकते थे, तो इस साल प्रशासन ‘मूकदर्शक’ क्यों बना है?
* आम जनता की पीड़ा: क्या शिक्षा अब केवल मुनाफे का धंधा बनकर रह गई है?
अजय विश्नोई का यह बयान केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है, बल्कि उन हजारों अभिभावकों की आवाज है जो हर साल अपने बच्चों की शिक्षा के नाम पर ‘लूट’ का शिकार होते हैं।
“निजाम बदला, मिजाज बदला” का यह जुमला अब आने वाले दिनों में प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है। देखना होगा कि इस राजनीतिक प्रहार के बाद जबलपुर जिला प्रशासन नींद से जागता है या ‘महंगाई का यह मेला’ यूँ ही चलता रहेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, मझौली दर्पण न्यूज




