सोशल मीडिया पर मीम्स और इंजीनियरिंग के मज़ाक का केंद्र बना ऐशबाग रेल ओवर ब्रिज एक बार फिर सुर्खियों में है।
भोपाल
मध्य प्रदेश के PWD मंत्री राकेश सिंह ने ब्रिज के ‘खतरनाक मोड़’ के आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि यह 90 नहीं, बल्कि 119 डिग्री का डिज़ाइन एंगल है—और विकसित देशों में भी ऐसे कर्व वाले पुल मौजूद हैं।
मंत्री ने कहा कि निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ है और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया गया। उनके मुताबिक, ट्रैफिक फ्लो, उपलब्ध भूमि और रेलवे लाइन की बाधाओं को ध्यान में रखकर कर्व तय किया गया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि डिज़ाइन को सक्षम इंजीनियरों की मंजूरी प्राप्त है।
हालांकि, विपक्ष और स्थानीय नागरिकों का तर्क है कि तीखा मोड़ दुर्घटना की आशंका बढ़ा सकता है, खासकर भारी वाहनों और तेज़ रफ्तार ट्रैफिक के लिए। सोशल मीडिया पर ब्रिज की तस्वीरें वायरल होने के बाद से सवाल उठ रहे हैं कि क्या साइट पर पर्याप्त साइनेंज, स्पीड-कैलिब्रेशन और रोड-मार्किंग की व्यवस्था है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कर्व्ड ब्रिज असामान्य नहीं होते, लेकिन उनकी सुरक्षा ट्रैफिक मैनेजमेंट, दृश्यता (sight distance), बैंकिंग/सुपर-एलीवेशन और चेतावनी संकेतों पर निर्भर करती है। यदि ये मानक सख्ती से लागू हों तो जोखिम कम किया जा सकता है।
अब निगाहें PWD और जिला प्रशासन पर हैं—क्या स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाएगा? क्या स्पीड लिमिट, रंबल स्ट्रिप्स और अतिरिक्त लाइटिंग जैसे उपाय तुरंत लागू होंगे? ऐशबाग ब्रिज पर उठी बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा का संतुलन कैसे साधा जाए।




