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Tuesday, February 24, 2026

मातृत्व बन गया मुनाफ़े का सौदा!

भारत में जन्म देने का दर्द अब डॉक्टरों के रेवेन्यू टारगेट की गिरफ़्त में

नई दिल्ली।

भारत में मातृत्व अब प्यार, भरोसे और सामाजिक संवेदना का प्रतीक कम — और अरबों के बिज़नेस मॉडल का हिस्सा ज़्यादा बनता जा रहा है। सबसे बड़ी कीमत चुका रही हैं वे मांएं, जिनकी डिलीवरी नॉर्मल हो सकती है मगर उन्हें ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर सिजेरियन कराया जा रहा है।

एक चौंकाने वाला अंतर—जहाँ डिफेंस (ARMY/NAVY/Airforce) हॉस्पिटल्स में 90% तक नॉर्मल डिलीवरी होती हैं, वहीं सिविल सिस्टम में 60-70% प्रसव सिजेरियन से कराए जा रहे हैं।

क्यों? जवाब बेहद चुभने वाला है—क्योंकि प्राइवेट हॉस्पिटल्स पर हर महीने टारगेट पूरा करने का दबाव होता है—

OT फुल रहनी चाहिए

सर्जरी की संख्या घटनी नहीं चाहिए

बिल बड़ा होना चाहिए

नॉर्मल डिलीवरी = कम कमाई

सिजेरियन बड़ा बिल  बड़ा मुनाफ़ा

मां के शरीर की पीड़ा, परिवार की आर्थिक मजबूरी और नवजात की सेहत — यह सब मुनाफ़े की दौड़ में पीछे छूट जाता है।

कोविड लॉकडाउन ने पोल खोली!

लॉकडाउन के दौरान जब अस्पताल पहुँचना मुश्किल था, तब हज़ारों बच्चों का सुरक्षित होम डिलीवरी से जन्म हुआ।

साफ़ है— समस्या मां के शरीर में नहीं, हॉस्पिटल प्रेशर सिस्टम में है।

यह चिकित्सा नहीं — संगठित शोषण है।

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र आज सबसे बड़े अनियंत्रित लूट का मैदान बन चुका है— अनावश्यक जांचें

टिश्यू-पेपर जैसे बिल

कोई जवाबदेही नहीं

कोई पब्लिक ऑडिट नहीं

मातृत्व को बाज़ार बनाना — राष्ट्रीय अपराध!

भारत जैसे देश में, जहाँ संस्कार कहते हैं — “मां भगवान होती है”,

वहीं बाज़ार कह रहा है — “मां मुनाफ़े का साधन है”।

अब सवाल उठना ज़रूरी है—बच्चा पैदा करना व्यापार कैसे बन गया?

मां की पीड़ा पर सौदा कौन कर रहा है?

सुधार की दिशा में देश को यह 5 कदम तुरंत उठाने होंगे— हर हॉस्पिटल को अपना सिजेरियन रेट सार्वजनिक करना अनिवार्य हो

डॉक्टरों पर रेवेन्यू/सर्जरी टारगेट की कानूनी समाप्ति

मेडिकल काउंसिल द्वारा नियमित ऑडिट

हर प्रसूता को सेकंड ओपिनियन का कानूनी अधिकार

प्राइवेट हॉस्पिटल की प्राइस कैपिंग और पारदर्शी बिलिंग

यह सिर्फ आँकड़ों की लड़ाई नहीं — यह उन परिवारों की आवाज़ है, जिनकी सुनवाई अब तक नहीं हुई।

मातृत्व को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाना — देश की जिम्मेदारी है, विकल्प नहीं।

अब भारत को फैसला करना होगा—मां की कोख बिज़नेस है या देश की सबसे बड़ी पूंजी?

सुंदरलाल बर्मन
सुंदरलाल बर्मनhttps://majholidarpan.com/
Sundar Lal barman (41 years) is the editor of MajholiDarpan.com. He has approximately 10 years of experience in the publishing and newspaper business and has been a part of the organization for the same number of years. He is responsible for our long-term vision and monitoring our Company’s performance and devising the overall business plans. Under his Dynamic leadership with a clear future vision, the company has progressed to become one of Hindi e-newspaper , with Jabalpur district.

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