मध्यप्रदेश ग्रामीण संपर्कता योजना के तहत मझौली रोड से सिमरिया घाट तक निर्मित बी.टी. सड़क का पाँच वर्षीय संधारण कार्य अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है।
मझौली (जबलपुर)
स्थानीय स्तर पर सामने आई हकीकत यह संकेत दे रही है कि सड़क का संधारण काग़ज़ों में पूरा दिखा दिया गया, जबकि ज़मीन पर स्थिति इसके ठीक उलट है। इस पूरे मामले में इंजीनियर–ठेकेदार गठजोड़ के आरोप खुलकर सामने आ रहे हैं।
उक्त सड़क के लिए संधारण अवधि 16 जून 2025 से 15 जून 2030 निर्धारित है, जिसके अंतर्गत कुल ₹6.12 लाख की राशि स्वीकृत की गई है। संधारण कार्य का ठेका रूथ कंस्ट्रक्शन, कपुर को दिया गया है। योजना प्रावधानों के अनुसार हर वर्ष घास एवं झाड़ियों की कटाई, रेनकट्स का सुधार, पॉटहोल व क्रैक भराई, सोल्डर व नालियों का संधारण तथा पुल–पुलियों की मरम्मत जैसे कार्य अनिवार्य हैं।
हालांकि, सड़क की वर्तमान स्थिति इन दावों की पोल खोलती नज़र आती है। कई स्थानों पर गड्ढे बने हुए हैं, झाड़ियाँ सड़क किनारे फैली हुई हैं, नालियाँ जाम हैं और पुल–पुलियों की स्थिति भी दयनीय बनी हुई है। इसके बावजूद संधारण कार्यों को पूर्ण दर्शाते हुए भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
सूत्रों के अनुसार बिना वास्तविक कार्य के मापन पुस्तिका (एमबी) भरी गई, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र जारी हुए और बिल पास कर ठेकेदार को भुगतान कर दिया गया। जानकारों का कहना है कि विभागीय अभियंताओं की स्वीकृति के बिना यह प्रक्रिया संभव नहीं है, जिससे इस पूरे प्रकरण में जेई, एई, एसडीओ और ईई स्तर तक की जिम्मेदारी तय होना स्वाभाविक है।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि संधारण के नाम पर केवल औपचारिक निरीक्षण किए गए। कभी-कभार स्थल भ्रमण दिखाकर फोटो और काग़ज़ी कार्रवाई पूरी कर ली गई, जबकि वास्तविक सुधार कार्य नहीं हुए। परिणामस्वरूप यह सड़क आज ग्रामीणों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि जोखिम का कारण बनती जा रही है।
इस मार्ग से सिमरिया घाट तक आवागमन करने वाले नागरिकों, किसानों और आपातकालीन सेवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बरसात के मौसम में दुर्घटनाओं की आशंका और भी बढ़ जाती है, जिससे योजना के मूल उद्देश्य पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।
प्रकरण को लेकर अब मांग उठ रही है कि संधारण कार्यों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, भुगतान से जुड़े दस्तावेज़ों की गहन समीक्षा हो और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों व ठेकेदार के विरुद्ध लोकायुक्त या आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) के माध्यम से कार्रवाई की जाए।
मझौली–सिमरिया सड़क का यह मामला अब केवल एक सड़क तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी तंत्र की साख की परीक्षा बन चुका है।




