मध्य प्रदेश में आत्महत्याएं अब आंकड़ा नहीं, लगातार चल रहा सामाजिक संकट बन चुकी हैं।
भोपाल
विधानसभा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दिए गए लिखित जवाब ने प्रदेश की हकीकत को बेनकाब कर दिया है—हर दिन कम से कम एक छात्र आत्महत्या कर रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, पिछले 769 दिनों में 987 छात्रों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यानी औसतन हर 18 घंटे में एक छात्र की मौत। यह आंकड़ा किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का परिणाम है जो युवाओं को सपने तो दिखाती है, सहारा नहीं।
किसान और खेत मजदूर भी मौत के आंकड़ों में
छात्र ही नहीं, अन्नदाता और खेत मजदूर भी इसी दौर में टूटते रहे।
562 किसानों ने आत्महत्या की — लगभग हर दिन एक।
667 खेत मजदूर भी इसी अवधि में मौत को गले लगाने को मजबूर हुए।
यह साफ करता है कि संकट केवल शिक्षा तक सीमित नहीं, रोज़गार, खेती और ग्रामीण जीवन की जड़ों तक फैला है।
हर दिन 42 मौतें: प्रदेश ‘साइलेंट क्राइसिस’ में
मुख्यमंत्री के जवाब में सबसे भयावह आंकड़ा यह है कि
13 दिसंबर 2023 से 20 जनवरी 2026 तक कुल 32,385 लोगों ने आत्महत्या की।
यानि पिछले दो वर्षों में हर दिन औसतन 42 लोग खुदकुशी कर रहे हैं।
यह संख्या किसी युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदा से कम नहीं—बस फर्क इतना है कि इसमें दुश्मन अदृश्य है और जिम्मेदारी तय नहीं।
कारण अनेक, जवाबदेही शून्य
सरकारी आंकड़ों के अनुसार आत्महत्याओं के कारण अलग-अलग बताए गए हैं—परीक्षा का दबाव, बेरोज़गारी, कर्ज़, पारिवारिक तनाव, बीमारी और आर्थिक तंगी।
लेकिन सवाल यह है कि अगर कारण अलग-अलग हैं, तो समाधान क्यों नहीं दिखता?
नीतियों की चमक, ज़मीनी सच्चाई काली
एक ओर ‘युवा शक्ति’, ‘किसान कल्याण’ और ‘विकसित मध्य प्रदेश’ के दावे,
दूसरी ओर हर दिन दर्जनों घरों में मातम।
क्या छात्र काउंसलिंग केवल कागज़ों तक सीमित है?
क्या किसानों के लिए राहत योजनाएं सिर्फ घोषणाएं हैं?
और क्या खेत मजदूर इस व्यवस्था में कहीं गिने ही नहीं जाते?
सवाल अब सरकार से नहीं, समाज से भी
यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, सामूहिक संवेदनहीनता का परिणाम भी है।
जब तक आत्महत्या को “व्यक्तिगत समस्या” मानकर फाइल बंद होती रहेगी, तब तक यह आंकड़ा बढ़ता रहेगा।
मध्य प्रदेश आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है,
जहां सवाल यह नहीं कि कितनी आत्महत्याएं हुईं
सवाल यह है कि कितनी और होंगी, इससे पहले कि हम जागें?




