मध्यप्रदेश सरकार ने एक बार फिर 2500 करोड़ रुपये का नया कर्ज उठाया है, जिससे राज्य पर कुल कर्ज का बोझ और बढ़ गया है।
भोपाल
वित्तीय वर्ष के दौरान अब तक राज्य पर कुल 91,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार जुड़ चुका है, जिसने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, विकास कार्यों, अधोसंरचना परियोजनाओं और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकार लगातार बाजार से कर्ज ले रही है। हालांकि, कर्ज लेने की यह रफ्तार अब चिंता का विषय बनती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य की आय (Revenue) की तुलना में कर्ज का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है, जिससे आने वाले समय में वित्तीय दबाव और बढ़ सकता है।
सरकार का दावा है कि यह कर्ज मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में खर्च किया जा रहा है— सड़क, पुल और अधोसंरचना विकास शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार सामाजिक सुरक्षा योजनाएं किसानों और गरीब वर्ग के लिए राहत योजनाएं
विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा है कि “बिना ठोस आय के स्रोत बढ़ाए, लगातार कर्ज लेना प्रदेश को आर्थिक संकट की ओर धकेल सकता है।” विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनावी वादों और योजनाओं को पूरा करने के लिए अंधाधुंध उधारी कर रही है।
वहीं, सरकार का कहना है कि कर्ज लेना एक सामान्य वित्तीय प्रक्रिया है और इसका उपयोग प्रदेश के दीर्घकालिक विकास के लिए किया जा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि राज्य की जीडीपी (GSDP) के अनुपात में कर्ज अभी भी नियंत्रित स्तर पर है।
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, अगर कर्ज की यही गति बनी रही तो भविष्य में ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ेगा, जिससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध बजट सीमित हो सकता है।
मध्यप्रदेश में विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए कर्ज जरूरी हो सकता है, लेकिन इसकी बढ़ती मात्रा आने वाले समय में आर्थिक संतुलन के लिए चुनौती बन सकती है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार कर्ज के साथ-साथ आय बढ़ाने के ठोस उपाय कैसे करती है।




