जाति प्रमाण-पत्रों की जांच में बरती जा रही घोर लापरवाही पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से जवाब-तलब रिपोर्ट मांगी है।
जबलपुर
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि जाति सत्यापन जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में ढिलाई बरती गई, तो यह संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ खिलवाड़ और सामाजिक न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि फर्जी या संदिग्ध जाति प्रमाण-पत्र न केवल आरक्षण व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि वास्तविक पात्रों का हक भी छीनते हैं। कोर्ट ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर नाराज़गी जताते हुए पूछा कि वर्षों तक लंबित मामलों में अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिए हैं कि वह जांच प्रक्रिया, समय-सीमा, जिम्मेदार अधिकारियों और अब तक की कार्रवाई का पूरा ब्योरा प्रस्तुत करे। संकेत साफ हैं—यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी और सख्त आदेश आ सकते हैं। यह फैसला प्रशासन के लिए चेतावनी है कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी।




