इंस्टाग्राम पर स्क्रॉल करते हुए जो सरकारी योजनाओं की चमकदार रीलें दिखती हैं—मुस्कुराते चेहरे, देशभक्ति संगीत और “सब कुछ शानदार” बताने वाले संदेश—वो महज़ संयोग नहीं हैं।
नई दिल्ली/भोपाल
इसके पीछे सरकारी खजाने से बहता करोड़ों का पैसा है।
RTI से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि वर्ष 2024-25 में भारत सरकार ने सोशल मीडिया प्रचार के लिए 4 करोड़ 32 लाख रुपये खर्च किए। यह राशि सीधे-सीधे सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर्स, कंटेंट क्रिएटर्स और डिजिटल प्रचार एजेंसियों को भुगतान के रूप में दी गई।
रील देखकर जनता, कमाई करते इन्फ़्लुएंसर
आज हालात ये हैं कि—बेरोज़गार युवा नौकरी ढूंढ रहा है
किसान लागत और कर्ज से जूझ रहा है
विश्वविद्यालय शिक्षक विहीन हैं
अस्पतालों में स्टाफ की कमी है
लेकिन सरकार की प्राथमिकता है—इंस्टाग्राम रील, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल इमेज बिल्डिंग
सरकारी योजनाओं के नाम पर बनाए गए ये छोटे-छोटे वीडियो दरअसल पेड प्रमोशन हैं, जिनके बदले इन्फ़्लुएंसर्स को मोटी रकम दी जाती है। सवाल यह नहीं कि प्रचार क्यों—सवाल यह है कि क्या टैक्स का पैसा रीलबाज़ी पर उड़ाना ज़रूरी था?
जवाबदेही किसकी?
RTI में सामने आए आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं किसे, कितना और किस आधार पर भुगतान किया गया?
क्या इन इन्फ़्लुएंसर्स के चयन में पारदर्शिता थी?
क्या यह सूचना “जनहित” में थी या सिर्फ़ इमेज मैनेजमेंट
जब देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे बुनियादी क्षेत्रों में धन की कमी का रोना रोया जाता है, तब सोशल मीडिया पर चमक बिखेरने के लिए करोड़ों खर्च करना नीतिगत प्राथमिकताओं पर सवालिया निशान लगाता है।
लोकतंत्र या डिजिटल दिखावा?
लोकतंत्र में सरकार का काम ज़मीन पर काम करना होता है, न कि रील में देश चलाना।
लेकिन आज स्थिति यह है कि—नीति कम, प्रचार ज़्यादा
काम कम, कैमरा ज़्यादा
अब जनता पूछ रही है—क्या भारत सरकार देश चला रही है या इंस्टाग्राम अकाउंट?
और सबसे बड़ा सवाल—टैक्स देने वाली जनता
को हक़ीक़त चाहिए या फ़िल्टर लगी रीलें?




