राज्य की वित्तीय सेहत पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए सरकार ने एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार 5,000 करोड़ रुपये का नया कर्ज उठा लिया है।
भोपाल
हैरानी की बात यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में अब तक कुल कर्ज 67,300 करोड़ रुपये तक बढ़ चुका है, जिससे खजाने की हालत और नीति-प्रबंधन पर सवालिया निशान लगना लाज़मी है।
सरकार जहां विकास और जनकल्याण की बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही है, वहीं हकीकत यह है कि इन योजनाओं का बोझ लगातार कर्ज लेकर पूरा किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कर्ज का यह सिलसिला अगर यूं ही जारी रहा, तो आने वाले समय में ब्याज भुगतान ही राजस्व का बड़ा हिस्सा निगल जाएगा।
चिंता की बात यह भी है कि कर्ज बढ़ने के बावजूद जमीनी स्तर पर न रोजगार दिख रहा है, न बुनियादी सुविधाओं में ठोस सुधार। सवाल उठता है कि आखिर इतना कर्ज जा कहां रहा है? क्या सरकार भविष्य की पीढ़ियों पर आर्थिक बोझ लाद रही है? वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता के बिना यह कर्ज़ राज्य को विकास नहीं, संकट की ओर धकेलता दिख रहा है।




