मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों के अध्यक्षों के वित्तीय अधिकारों को लेकर बड़ा संवैधानिक और प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है।
भोपाल
हालिया घटनाक्रम और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसलों के बाद कई नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों की शक्तियां प्रभावित हो गई हैं।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 में हुए नगरीय निकाय चुनावों के बाद कई अध्यक्षों के निर्वाचन का राजपत्र (गजट) में प्रकाशन नहीं किया गया।
नियमों के मुताबिक, बिना गजट नोटिफिकेशन के किसी भी अध्यक्ष को पूर्ण वित्तीय अधिकार नहीं मिल सकते।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कई मामलों में अध्यक्षों के अधिकारों को शून्य मान लिया है।
अब तक सामने आए मामलों में—श्योपुर – नगर पालिका अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शून्य पानसेमल – नगर परिषद अध्यक्ष के अधिकार समाप्त नागदा – हाई कोर्ट द्वारा 6 सप्ताह के लिए वित्तीय अधिकारों पर
यह संकट केवल तीन निकायों तक सीमित नहीं है।
राज्य के लगभग—98 नगर पालिका 297 नगर परिषद
कुल 395 नगरीय निकायों के अध्यक्षों के अधिकारों पर संकट गहरा गया है, क्योंकि इनमें से अधिकांश का गजट नोटिफिकेशन लंबित बताया जा रहा है।
इस स्थिति का सीधा असर नगरीय प्रशासन पर पड़ रहा है— अध्यक्ष अब वित्तीय फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते
कामकाज की जिम्मेदारी CMO और SDM के हाथों में भुगतान और विकास कार्यों पर ब्रेक वार्षिक बजट पारित होने में संकट
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मोहन यादव सरकार पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि
प्रशासनिक लापरवाही (गजट नोटिफिकेशन न करना) के कारण निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को “बिना शक्ति” के छोड़ दिया गया है।
विपक्ष का आरोप है कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है, जबकि सत्ता पक्ष इस मामले में जल्द समाधान का दावा कर रहा है।
मध्य प्रदेश में नगरीय निकायों का यह संकट केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
अब सबकी नजर सरकार और न्यायालय के अगले कदम पर टिकी है, जिससे तय होगा कि जनप्रतिनिधियों को उनका अधिकार वापस मिलेगा या संकट और गहराएगा।




