महेंद्र लोधी की मृत्यु के बाद अब उनके परिजन अस्थियां हाथ में लेकर न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन प्रशासन अब भी पत्थर बना बैठा है।
दमोह
सवाल यह है कि क्या देश में पहली बार किसी मृतक की अस्थियों को रोकने के लिए लाठियां और बंदूकें तैनात की गई हैं? यह दृश्य सिर्फ अमानवीय नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान दोनों के मुंह पर तमाचा है।
परिजनों का साफ कहना है कि यदि पुलिस और प्रशासन ने समय रहते ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया होता, तो महेंद्र लोधी को आत्महत्या जैसा कदम उठाने की नौबत ही नहीं आती। लेकिन यहां तो हालात यह हैं कि मौत के बाद भी पीड़ित परिवार को डराया-धमकाया जा रहा है।
आज बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या न्याय और न्यायालय सिर्फ नाम के लिए रह गए हैं? क्या पुलिस की भूमिका सिर्फ गरीब, कमजोर और मासूम लोगों को प्रताड़ित करने तक सीमित हो गई है?
अधिकारी हों या जनप्रतिनिधि—सबके मुंह में दही जम गया है। न कोई संवेदना, न कोई जवाबदेही।
दमोह की यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की नैतिक मृत्यु का प्रमाण बनती जा रही है।
अब सवाल यही है—आख़िर कब मिलेगा इंसाफ? या फिर अस्थियों के साथ उठती यह आवाज़ भी फाइलों में दफन कर दी जाएगी?




