कानून-व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली डायल 112 सेवा इन दिनों अपने ही ढांचे में उलझती नजर आ रही है।
जबलपुर
हालात ऐसे बन गए हैं कि जमीनी स्तर पर सक्रियता कम और कागजी औपचारिकताएं ज्यादा भारी पड़ रही हैं। हालिया स्थिति को लेकर पुलिस व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
“संगमरमर की बाजी हारी, वीआईपी ड्यूटी भारी — यह पंक्ति वर्तमान हालात को बखूबी बयान करती है, जहां आम जनता की सुरक्षा से ज्यादा वीआईपी ड्यूटी और प्रोटोकॉल प्राथमिकता बनती जा रही है। नतीजतन, डायल 112 जैसी त्वरित सेवा का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।’
सूत्रों के मुताबिक, कई जगहों पर जिम्मेदार अधिकारी मैदान में सक्रिय रहने के बजाय दफ्तरों में बैठकर रजिस्टर और कागजों में उलझे नजर आ रहे हैं। उप-कप्तान स्तर के अधिकारी तक “रजिस्टर बाबू” की भूमिका में सीमित होते दिख रहे हैं, जिससे जमीनी मॉनिटरिंग कमजोर पड़ रही है।
जमीनी हकीकत यह है कि जहां घटनास्थलों पर तुरंत पहुंचना जरूरी है, वहां कई बार डायल 112 की प्रतिक्रिया समय पर नहीं पहुंच पा रही। जबकि रिकॉर्ड में सब कुछ “दुरुस्त” दिखाया जा रहा है।
यानी, मैदान खाली और पन्ने भारी — व्यवस्था का यही विरोधाभास अब चर्चा का विषय बन गया है।
“मन चंगा तो कठौती में गंगा” — या पद-पिपासा?
पुलिस महकमे के भीतर एक और चर्चा जोरों पर है—
“मन चंगा तो कठौती में गंगा” की कहावत के उलट अब कई अधिकारी पद-पिपासा” के इम्तिहान में उलझे नजर आ रहे हैं।
कहा जा रहा है कि अच्छी पोस्टिंग और मलाईदार जिम्मेदारियों की चाह** ने कार्यप्रणाली को प्रभावित किया है।
अंदरखाने यह भी चर्चा है कि कुछ अधिकारी पोस्टिंग को ‘मेन्यू कार्ड’ की तरह देख रहे हैं जहां क्षेत्र की संवेदनशीलता या जनता की जरूरत से ज्यादा “सुविधा और फायदे” को प्राथमिकता दी जा रही है।
इन हालातों का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है आपातकालीन स्थितियों में देरी से मदद पुलिस की कमजोर उपस्थिति शिकायतों के समाधान में लापरवाही
विशेषज्ञों का मानना है कि डायल 112 की जमीनी मॉनिटरिंग मजबूत की जाए
वीआईपी ड्यूटी और जनसेवा के बीच संतुलन बनाया जाए और जवाबदेही तय कर सख्त कार्रवाई की जाए
अब देखना होगा कि पुलिस प्रशासन इस आलोचना को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या डायल 112 सेवा को फिर से उसकी मूल भावना—त्वरित और प्रभावी सहायता—तक पहुंचा पाता है या नहीं।
(मझौली दर्पण न्यूज़)




