मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली
भोपाल/जबलपुर/इंदौर।
देश 2047 तक विकसित भारत बनने का सपना देख रहा है, लेकिन मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की हकीकत इस सपने को कठघरे में खड़ा कर रही है।
प्रदेश के शासकीय विश्वविद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले भारी संख्या में शिक्षक पद खाली पड़े हैं। हालत यह है कि कई विश्वविद्यालयों में 90% से अधिक पद रिक्त हैं, फिर भी शासन-प्रशासन मौन है।
विश्वविद्यालयों में पदों की भयावह स्थिति
मध्यप्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में स्वीकृत और रिक्त पदों का आंकड़ा चौंकाने वाला है—बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल स्वीकृत 105 | खाली 69 सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन स्वीकृत 161 खाली 117
रानी दुर्गावर्ती विश्वविद्यालय, जबलपुर
स्वीकृत 156 खाली 138 देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय, इंदौर स्वीकृत 154 खाली 73
जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर
स्वीकृत 104 खाली 80 अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा स्वीकृत 76 खाली 49
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल
स्वीकृत 27 खाली 14 एस.एन. शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल स्वीकृत 121 खाली 97
राजा शंकरशाह विश्वविद्यालय, छिंदवाड़ा
स्वीकृत 175 खाली 175 (एक भी नियमित शिक्षक नहीं!)
क्रांतिसूर्य टंटया भील विश्वविद्यालय, खरगोन
स्वीकृत 140 खाली 140
म.प्र. भोज मुक्त विश्वविद्यालय, भोपाल
स्वीकृत 54 खाली 50
महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर
स्वीकृत 140 खाली 140
रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय, सागर
स्वीकृत 140 खाली 140
नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी, भोपाल
स्वीकृत 91 खाली 59
डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय, महू
स्वीकृत 113 खाली 106
महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय
स्वीकृत 119 खाली 45
धर्मशास्त्र विधि विश्वविद्यालय, जबलपुर
स्वीकृत 57 खाली 35
महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन
स्वीकृत 30 खाली 21
सवाल सीधे-सीधे हैं
जब विश्वविद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो—शोध कैसे होगा?
गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई कैसे मिलेगी?
छात्र ‘विकसित भारत’ के लिए कैसे तैयार होंगे?
आज स्थिति यह है कि अतिथि विद्वानों, अस्थायी व्यवस्थाओं और जुगाड़ के भरोसे विश्वविद्यालय चलाए जा रहे हैं। स्थायी नियुक्तियां वर्षों से लंबित हैं, फाइलें धूल खा रही हैं और छात्र भविष्य से समझौता करने को मजबूर हैं।
सरकार और उच्च शिक्षा विभाग कटघरे में
शासन द्वारा हर मंच पर शिक्षा सुधार और ज्ञान अर्थव्यवस्था की बातें की जाती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि विश्वविद्यालय शिक्षक विहीन होते जा रहे हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।




