जहां एक ओर सरकारी अस्पतालों को गरीबों की जीवन रेखा माना जाता है, वहीं अब वही अस्पताल मौत का कारण बनते नजर आ रहे हैं।
भोपाल/जबलपुर/मझौली
मध्य प्रदेश में नकली और घटिया दवाओं की सप्लाई का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए है
जांच में फेल हुईं दवाएं, सिस्टम पर सवाल
हाल ही में हुई जांच में 10 दवाएं गुणवत्ता परीक्षण में फेल** पाई गई हैं।
यह केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि सीधे-सीधे मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।
25 से ज्यादा मासूमों की मौत, फिर भी खामोशी
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जहरीली/घटिया दवाओं के कारण 25 से अधिक बच्चों की जान जा चुकी है इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग अब तक ठोस कार्रवाई करने में नाकाम नजर आ रहा है यह स्थिति बताती है कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का है।
सरकारी अस्पताल बने खतरे का केंद्र?
जहां मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, वहीं उन्हें
नकली दवाएं या घटिया गुणवत्ता की दवाएं
दी जा रही हैं — जो बीमारी ठीक करने के बजाय और गंभीर बना रही हैं
कौन है जिम्मेदार?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि:इन दवाओं की सप्लाई किसने की? गुणवत्ता जांच में चूक कैसे हुई? जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक जनता का भरोसा बहाल होना मुश्किल है।




