जनपद पंचायत मझौली अंतर्गत ग्राम पंचायत हटौली की गोकुल गौशाला आज प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेहीहीन व्यवस्था की सबसे शर्मनाक मिसाल बन चुकी है।
मझौली जबलपुर
27.72 लाख रुपये की लागत से बनी यह गौशाला, जिसका लोकार्पण बड़े मंच और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में किया गया था, आज गौमाताओं के लिए संरक्षण स्थल नहीं बल्कि पीड़ा का केंद्र बन गई है।
रिकॉर्ड के अनुसार गौशाला का निर्माण वर्ष 2019–20 में हुआ, कार्य समय पर पूरा हुआ और 19 दिसंबर 2020 को लोकार्पण भी कर दिया गया। कागज़ों में सब कुछ दुरुस्त है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि गौमाताओं को न भरपेट चारा मिल रहा है, न स्वच्छ पानी और न ही इलाज। ग्रामीणों का आरोप है कि भूख और अव्यवस्था के चलते कई गायें दम तोड़ चुकी हैं, जो सीधे-सीधे अमानवीय कृत्य की श्रेणी में आता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि यह गौशाला स्व-सहायता समूह के हवाले है और लगातार की जा रही शिकायतों के बावजूद न जनपद पंचायत, न संबंधित विभाग और न ही स्थानीय प्रशासन ने कोई ठोस कदम उठाया। अधिकारी-कर्मचारी केवल मूकदर्शक बने हुए हैं मानो उन्हें गौमाताओं की दुर्दशा से कोई सरोकार ही न हो।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
जब 27.72 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, तो गौशाला संचालन के लिए मिलने वाली राशि कहां जा रही है?क्या स्व-सहायता समूह की जवाबदेही तय होगी?
या फिर गौ संरक्षण सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रहेगा?
एक ओर सरकार गौ संरक्षण को आस्था और नीति दोनों बताती है, दूसरी ओर हटौली की गोकुल गौशाला सरकारी दावों पर करारा तमाचा है। ग्रामीणों ने तत्काल उच्चस्तरीय जांच, दोषियों पर एफआईआर और संचालन व्यवस्था बदलने की मांग की है।
अब सवाल सिर्फ गौशाला का नहीं, प्रशासन की संवेदनशीलता और ईमानदारी का है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह चुप्पी भी अपराध मानी जाएगी।




