सरकारी नौकरी में सोशल मीडिया पर अपनी राय रखना एक शिक्षक को इतना महंगा पड़ा कि उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी।
विदिशा/भोपाल
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक शासकीय शिक्षक द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के वीडियो पर किए गए एक कमेंट को ‘कदाचार’ मानते हुए शिक्षा विभाग ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
इस कार्रवाई ने प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है— क्या सरकारी कर्मचारी को सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी है?
📍 क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, सोशल मीडिया पर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक वीडियो वायरल हो रहा था। विदिशा के एक सरकारी स्कूल में पदस्थ शिक्षक ने उस वीडियो के नीचे एक कमेंट पोस्ट किया।
आरोप: प्रशासन का तर्क है कि शिक्षक का कमेंट ‘अमर्यादित’ था और सिविल सेवा आचरण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।
शिक्षक का पक्ष: निलंबित शिक्षक का कहना है कि, “मैंने अपने कमेंट में न तो किसी का नाम लिया और न ही किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाया। यह केवल एक सामान्य प्रतिक्रिया थी।”
निलंबन की इस गाज के बाद शिक्षक ने झुकने के बजाय कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया है। शिक्षक का कहना है कि प्रशासन ने जल्दबाजी में और दबाव में यह कार्रवाई की है।
“मैंने कोई अपराध नहीं किया है। लोकतंत्र में अपनी बात रखने का हक सबको है। मैं इस अन्यायपूर्ण निलंबन के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाऊँगा।”
मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत सरकारी कर्मचारियों पर कुछ पाबंदियां होती हैं:
वे सरकार की नीतियों की कठोर आलोचना नहीं कर सकते।
राजनीतिक गतिविधियों या विवादास्पद राजनीतिक टिप्पणियों से उन्हें दूर रहना होता है।
सोशल मीडिया पर किया गया कोई भी ऐसा कृत्य जो शासन की छवि धूमिल करे, अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बनता है।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में हाई कोर्ट ने एक अन्य मामले में मिमिक्री करने वाले शिक्षक के निलंबन पर रोक लगाई थी। विदिशा के इस मामले में भी अब सबकी नजरें कोर्ट पर टिकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है: यदि शिक्षक ने नाम नहीं लिया है, तो कोर्ट में प्रशासन को यह साबित करना मुश्किल होगा कि कमेंट किसे संबोधित था। वहीं दूसरी ओर, कर्मचारियों को चेतावनी दी जा रही है कि “नौकरी बचानी है, तो सोशल मीडिया की बाजीगरी से दूर रहें।”




