सरकार की महत्वाकांक्षी आरोग्य सेतु योजना के तहत मझौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अंतर्गत ग्राम पंचायत पड़वार में अस्पताल भवन तो खड़े कर दिए गए, लेकिन महीनों से डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी नहीं होने से ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है।
मझौली/जबलपुर
करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए ये अस्पताल आज सिर्फ ईंट-सीमेंट की शोपीस इमारत बनकर रह गए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि अस्पतालों में न डॉक्टर मिलते हैं, न नियमित ओपीडी चलती है। गंभीर मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों या जिला मुख्यालय का रुख करना पड़ता है। सवाल यह है कि जब डॉक्टर ही नहीं, तो इन योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
अब सबसे बड़ा सवाल सीधे जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) पर उठ रहा है—क्या सीएमएचओ को इन हालात की जानकारी नहीं है? या फिर जानकारी होने के बावजूद जानबूझकर अनदेखी की जा रही है?
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि यही स्थिति शहरी क्षेत्र में होती, तो अब तक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो चुकी होती। लेकिन ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ हो रहा यह खिलवाड़ सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
अजय तिवारी की तीखी प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता अजय तिवारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा,“यह सीधी-सीधी जनता के पैसों की बर्बादी और ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। भवन बनाकर फोटो खिंचवा लेना आसान है, लेकिन डॉक्टरों की तैनाती और निगरानी करना जिम्मेदारों का काम है। यदि जल्द डॉक्टरों की नियमित पदस्थापना नहीं हुई, तो इस लापरवाही के खिलाफ जनआंदोलन किया जाएगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी सीएमएचओ पर तय की जाएगी।”




