एफआईआर के बाद भी सिस्टम मौन
मझौली जबलपुर
सरकारी कुर्सी का दुरुपयोग कर कानून को रौंदने का शर्मनाक और खतरनाक उदाहरण जबलपुर से सामने आया है। मझौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) अमित चंद्रा पर आरोप है कि उसने जिला अस्पताल परिसर को दबंगई का अखाड़ा बना दिया। थाना ओमती में दर्ज एफआईआर क्रमांक 75/2026 के अनुसार, आरोपी ने अपने पिता सुभाष चंद्रा पर दर्ज आपराधिक प्रकरण को वापस कराने के लिए सरकारी दफ्तर में घुसकर खुलेआम धमकीबाज़ी की।
6 फरवरी, दोपहर, कार्यालयीन समय—विक्टोरि

इतना ही नहीं, सत्ता और पद के नशे में चूर आरोपी यहीं नहीं रुका, बल्कि पीड़ित के निवास पर पहुंचकर उसके बुजुर्ग पिता को भी धमकाने का गंभीर आरोप है। पूरी घटना का वीडियो प्रमाण सामने आने के बाद पुलिस ने बीएनएस की धारा 232(1) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी आरोपी पूरी तरह बेखौफ है।
जानकारी के मुताबिक, एफआईआर के अगले ही दिन 7 फरवरी को अमित चंदा ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मझौली के ब्लॉक अधिकारी डॉ. दीपक गैयकवाड को व्हाट्सएप पर तीन दिन का अवकाश आवेदन भेज दिया। लेकिन इतने गंभीर आपराधिक मामले के बावजूद आज दिनांक तक न तो छुट्टी पर कोई आदेश है, न निलंबन, न विभागीय जांच—सिर्फ़ प्रशासनिक सन्नाटा।
यह चुप्पी सिर्फ़ लापरवाही नहीं, बल्कि संभावित संरक्षण और मिलीभगत की बू दे रही है। सवाल सीधा है—
क्या स्वास्थ्य विभाग में एफआईआर आरोपी अधिकारियों के लिए अलग कानून चलता है?
क्या अस्पताल जैसे संवेदनशील परिसर में गुंडागर्दी करने वाला अधिकारी कुर्सी के दम पर बचाया जा रहा है?
अगर ऐसे मामलों में तत्काल निलंबन और सख्त विभागीय कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संदेश जाएगा कि सरकारी पद अब सेवा नहीं, बल्कि दबंगई का हथियार बन चुका है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग कब जागता है—या फिर यह मामला भी रसूख, सिफारिश और फाइलों की धूल में दफन कर दिया जाएगा।
ब्लॉक अधिकारी की प्रतिक्रिया भी सवालों के घेरे में
मामले पर जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मझौली के ब्लॉक अधिकारी डॉ. दीपक गैयकवाड से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा—
*मामले की जानकारी मिली है। संबंधित कर्मचारी द्वारा भेजे गए अवकाश आवेदन पर उच्च अधिकारियों के दिशा-निर्देश के अनुसार ही निर्णय लिया जाएगा। जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।”
हालांकि यह जवाब औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ पाया। एफआईआर जैसे गंभीर आपराधिक प्रकरण के बाद भी तत्काल निलंबन, विभागीय जांच या स्पष्ट आदेश न दिया जाना प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े कर रहा है। स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी का यह टालमटोल भरा बयान अब और संदेह पैदा कर रहा है—क्या कार्रवाई जानबूझकर टाली जा रही है, या फिर आरोपी को बचाने की कोशिश की जा रही है?
अब निगाहें मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, कलेक्टर और स्वास्थ्य सचिव पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कब तक मौन तोड़ते हैं और क्या कानून से ऊपर खुद को समझने वाले अधिकारी पर वास्तविक और सख्त कार्रवाई होती है या नहीं।




