शहर में यातायात व्यवस्था सुधारने के नाम पर की जा रही कार्रवाई अब न्याय, संवेदनशीलता और प्रशासनिक विवेक पर सवाल खड़े करने लगी है।
कटनी
ताजा मामला एक ई-रिक्शा चालक से जुड़ा है, जो रोजाना 10–20 रुपये की सवारी ढोकर मुश्किल से 200–400 रुपये कमा पाता है, लेकिन यातायात नियमों के कथित उल्लंघन में उस पर ₹3000 का भारी-भरकम चालान काट दिया गया।
इस कार्रवाई के बाद शहरभर में नाराजगी फैल गई है। लोग पूछ रहे हैं—क्या नियम सिर्फ गरीबों के लिए बने हैं?
क्या कानून लागू करते समय मानवीय दृष्टिकोण पूरी तरह गायब हो चुका है?
मेहनत की कमाई पर सीधा वार
स्थानीय नागरिकों के अनुसार ई-रिक्शा चालक दिनभर तेज धूप, ट्रैफिक जाम और पुलिस की सख्ती के बीच मेहनत करता है। 200–400 रुपये की दैनिक आय में परिवार का पेट पालने वाला यह चालक ₹3000 के चालान से आर्थिक रूप से टूट चुका है। लोगों का कहना है कि नियम जरूरी हैं, लेकिन *बिना व्यवस्था दिए सिर्फ दंड देना अन्याय है।
बड़े वाहन, बड़े रसूख — कार्रवाई नदारद!
शहर में यह आम दृश्य बन चुका है कि महंगी कारें नो-पार्किंग में खड़ी रहती हैं वीआईपी नंबर प्लेट वाले वाहन नियम तोड़ते हैं
ट्रैफिक जाम फैलाने वाले बड़े वाहन बेखौफ घूमते हैं लेकिन कार्रवाई होती है तो ई-रिक्शा ठेला गरीब चालक पर!
यही वजह है कि आमजन में यह धारणा मजबूत हो रही है कि कानून का डंडा कमजोर वर्ग पर ही सबसे पहले और सबसे ज्यादा चलता है।
–व्यवस्था नहीं, फिर चालान क्यों?
नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि—ई-रिक्शा के लिए अलग लेन क्यों नहीं?
निर्धारित रूट और पार्किंग व्यवस्था कहां है?
यातायात पुलिस सिर्फ चालान काटने तक सीमित क्यों?
जब प्रशासन सुव्यवस्थित पार्किंग और यातायात ढांचा देने में विफल है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा
यातायात विभाग का कहना है कि चालानी कार्रवाई नियमों के तहत की गई है और भविष्य में ई-रिक्शा चालकों के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
लेकिन जनता का कहना है—जब तक व्यवस्था नहीं बनेगी, जागरूकता सिर्फ दिखावा है।
अब सवाल सिर्फ चालान का नहीं
यह मामला अब एक चालान से आगे निकल चुका है।
यह सवाल खड़ा कर रहा है कि— क्या कानून लागू करते समय संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है?
क्या गरीब की मजबूरी को अपराध मान लिया गया है?
क्या शहर को जाम में डुबो देने वाली अव्यवस्था के लिए कोई जिम्मेदार नहीं




