मध्य प्रदेश सरकार एक ओर “एक पेड़ माँ के नाम” जैसे भावनात्मक और पर्यावरण-संवेदनशील अभियानों के ज़रिये हर नागरिक से प्रकृति बचाने की अपील कर रही है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत इस सरकारी दावे पर करारा तमाचा मार रही है।
मझौली जबलपुर
ग्राम पंचायत हटोली अन्तर्गत आने वाले नरीला में आम के हरे-भरे बाग़ पर जिस तरह से खुलेआम आरी चलाई गई, उसने सरकार की नीयत और प्रशासन की निगरानी—दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन आम के पेड़ों को वर्षों तक सींचा गया, जिनसे न केवल किसानों की आजीविका जुड़ी थी बल्कि पर्यावरण को भी जीवन मिलता था, आज वही पेड़ बेरहमी से काट दिए गए।
हैरानी की बात यह है कि जिस ज़मीन पर यह कत्लेआम हुआ, वहां साफ-साफ एक बोर्ड लगा है—“भूमि (ग्राम–नरीला) खसरा नं. 162/2 विवादित है, प्रकरण क्रमांक A73/2024।”
यानी जिस भूमि पर कानूनी विवाद लंबित है, वहां पेड़ों की कटाई किस आदेश पर, किसके संरक्षण में और किस लाभ के लिए की गई—यह सबसे बड़ा सवाल है। क्या प्रशासन को इस विवाद की जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
बोर्ड पर दर्ज पक्षकारों—प्रताप साहू और योगेश श्रीवास्तव (संपर्क: 9424743851)—के नाम यह साफ संकेत देते हैं कि मामला न सिर्फ राजस्व विभाग से जुड़ा है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के अधीन भी है। इसके बावजूद आम के पेड़ों का सफाया यह साबित करता है कि कानून, पर्यावरण और सरकारी घोषणाएं—तीनों की खुलेआम अनदेखी की गई है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो “एक पेड़ माँ के नाम” केवल पोस्टर और भाषणों तक सीमित रह जाएगा, जबकि ज़मीन पर पेड़ काटने वालों को खुली छूट मिलती रहेगी।
अब सवाल यह नहीं है कि पेड़ क्यों काटे गए—
सवाल यह है कि विवादित ज़मीन पर पर्यावरण अपराध करने वालों पर कार्रवाई कब होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?




