मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सरकारी लापरवाही का एक ऐसा नमूना सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
छिंदवाड़ा
यहाँ एक किसान सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया है, जबकि हकीकत में वह पूरी तरह ज़िंदा है। विडंबना देखिए कि वह पिछले चार सालों से दफ्तर-दफ्तर भटक कर चिल्ला रहा है कि “साहब, मैं ज़िंदा हूँ”, लेकिन सरकारी फाइलें उसकी बात मानने को तैयार नहीं हैं।
किसान सम्मान निधि पर लगा ‘ग्रहण’
सरकारी कागज़ों में मृत दिखाए जाने का खामियाजा किसान को आर्थिक रूप से भुगतना पड़ रहा है। रिकॉर्ड में मौत दर्ज होने के कारण उसे केंद्र सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ का लाभ मिलना बंद हो गया है। किसान का कहना है कि आर्थिक मदद तो दूर, अब उसे अपनी पहचान बचाना भी मुश्किल हो रहा है।
4 साल से अधिकारियों के चक्कर
पीड़ित किसान पिछले 4 वर्षों से तहसील और कलेक्ट्रेट के चक्कर काट रहा है। उसने कई बार आवेदन दिए, शपथ पत्र पेश किए और अधिकारियों के सामने खुद पेश हुआ, फिर भी रिकॉर्ड में सुधार नहीं किया गया। यह लापरवाही दर्शाती है कि निचले स्तर पर पटवारी और राजस्व अमला किस कदर संवेदनहीन हो चुका है।
प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल
एक ज़िंदा इंसान को कागज़ों पर मार देना और फिर उसे सालों तक सुधारने के लिए मजबूर करना, न केवल मानसिक प्रताड़ना है बल्कि भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करता है। सवाल यह उठता है कि:
* आखिर बिना किसी पुख्ता प्रमाण या मृत्यु प्रमाण पत्र के किसान को मृत कैसे घोषित कर दिया गया?
* क्या ज़िम्मेदार अधिकारियों पर इस बड़ी लापरवाही के लिए कोई कार्रवाई होगी?
ब्यूरो रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज़




