सरकारी सिस्टम में सेंध लगाकर गरीबों के हक पर डाका डालने का खेल तेंदूखेड़ा जनपद में रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
तेंदूखेड़ा/दमोह
बीपीएल (BPL) कार्ड बनवाने के नाम पर कूट रचित (फर्जी) आदेशों का एक ऐसा मकड़जाल सामने आया है, जिसने प्रशासन की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलम यह है कि एक के बाद एक नए फर्जी आदेश मीडिया की सुर्खियों में हैं, लेकिन असली ‘मास्टरमाइंड’ अब भी पुलिस की पहुंच से दूर हैं।
दलालों का गढ़ बना मगदुपुरा और झलोन
ताजा मामला नायब तहसीलदार मंडल के मगदुपुरा और झलोन समेत कई कस्बों से जुड़ा है। यहाँ दलालों ने प्रशासनिक अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर और सील का उपयोग कर सैकड़ों कूट रचित आदेश जारी कर दिए। इन कागजी टुकड़ों के बदले भोले-भाले ग्रामीणों से मोटी रकम ऐंठी गई। यह महज एक या दो आदेशों का मामला नहीं है, बल्कि ऐसे सैकड़ों फर्जी दस्तावेज सरकारी फाइलों में तैर रहे हैं।
पुलिस की जांच पर सवाल: छोटे प्यादे जेल, बड़े नाम बाहर?
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में पुलिस की सुई कुछ चुनिंदा आरोपियों तक पहुंचकर अटक गई है। चर्चा है कि पुलिस ने जिन लोगों को आरोपी बनाया है, वे महज मोहरे हैं। इस भ्रष्टाचार की कड़ी जिन रसूखदारों और ‘सफेदपोशों’ से जुड़ती दिख रही है, वहां तक पहुंचने में पुलिस के हाथ-पांव फूल रहे हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर पुलिस की जांच उस कड़ी पर आकर क्यों रुक गई, जहां से इस पूरे सिंडिकेट का संचालन हो रहा है?
अधिकारी मौन, कार्रवाई ‘शून्य’
सूत्रों की मानें तो इस महाघोटाले की खबर जिला स्तर के आला अधिकारियों को भी है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस ‘शून्य’ की खोज भारत ने सदियों पहले की थी, आज दमोह प्रशासन कार्रवाई के मामले में उसी ‘शून्य’ पर टिका हुआ है। फाइलों में जांच की खानापूर्ति तो हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस एक्शन नजर नहीं आ रहा है।
सैकड़ों परिवार हुए ठगी के शिकार
दलालों ने बीपीएल सूची में नाम जुड़वाने का झांसा देकर गरीब परिवारों की गाढ़ी कमाई लूट ली। फर्जी आदेशों के आधार पर राशन कार्ड तो नहीं बने, लेकिन दलालों की जेबें जरूर गरम हो गईं। अब जनता पूछ रही है कि क्या इन कूट रचित आदेशों के असली सूत्रधारों पर कभी सलाखें गिरेंगी या छोटे आरोपियों की बलि देकर बड़े मगरमच्छों को बचा लिया जाएगा?
ब्यूरो रिपोर्ट: मझौली दर्पण न्यूज़




