राज्य में एक सरकारी डॉक्टर द्वारा एक ही समय पर दो अलग-अलग जिलों के सरकारी अस्पतालों में पूरी मुस्तैदी से नौकरी करने का ‘महाफर्जीवाड़ा’ उजागर हुआ है।
भोपाल
इस खुलासे ने विभाग की ऑनलाइन उपस्थिति, बायोमेट्रिक सिस्टम और मॉनिटरिंग दावों को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
इस सनसनीखेज मामले पर एक विस्तृत समाचार रिपोर्ट नीचे दी गई है:
डिजिटल मॉनिटरिंग फेल: MP में महाफर्जीवाड़ा, एक ही समय पर दो अलग-अलग जिलों में नौकरी कर रहा था सरकारी डॉक्टर!
खास बातें:
* अनोखा फर्जीवाड़ा: एक ही डॉक्टर, एक ही समय और दो अलग-अलग जिलों के शासकीय अस्पतालों में तैनाती।
*सिस्टम पर सवाल: स्वास्थ्य विभाग की ऑनलाइन ट्रैकिंग, मानव संपदा पोर्टल और डिजिटल मॉनिटरिंग पूरी तरह नाकाम।
* मिलीभगत की आशंका: बिना स्थानीय प्रशासनिक साठगांठ के इतने बड़े स्तर पर दोनों जगह से वेतन उठाना असंभव।
क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश के शासकीय महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब दस्तावेजी जांच में यह बात सामने आई कि स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ एक सरकारी डॉक्टर एक ही समय (टाइम पीरियड) में दो अलग-अलग जिलों के शासकीय चिकित्सालयों में अपनी सेवाएं दे रहा था। कागजों और हाजिरी रजिस्टरों के मुताबिक, डॉक्टर साहब एक ही दिन दोनों जिलों के अस्पतालों में मरीजों का इलाज भी कर रहे थे और दोनों ही जगहों से बकायदा सरकारी खजाने से वेतन (Salary) भी वसूल रहे थे।
इस महाफर्जीवाड़े ने यह साफ कर दिया है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य विभाग के पास अधिकारियों की उपस्थिति जांचने का कोई पुख्ता जरिया नहीं है।
डिजिटल दावों की खुली पोल
मध्य प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार यह दावा करते आए हैं कि डॉक्टरों की उपस्थिति और उनकी पोस्टिंग को पूरी तरह डिजिटल कर दिया गया है। ‘मानव संपदा पोर्टल’ और बायोमेट्रिक अटेंडेंस के जरिए हर कर्मचारी की गतिविधियों पर नजर रखने की बात कही जाती है। लेकिन इस मामले ने साबित कर दिया है कि:
1. पोर्टल लिंकिंग में खामी: विभाग का सॉफ्टवेयर इतना भी सक्षम नहीं है कि वह एक ही पैन कार्ड (PAN) या एम्प्लॉई आईडी (Employee ID) पर दो अलग-अलग जिलों से उठ रहे वेतन को ट्रैक कर सके।
2. बायोमेट्रिक लूपहोल: अगर उपस्थिति डिजिटल थी, तो डॉक्टर एक ही समय पर दो अलग-अलग जगहों पर अंगूठा या फेस डिटेक्शन कैसे दे रहा था? और यदि हाजिरी मैन्युअल (रजिस्टर पर) लग रही थी, तो इतने महीनों तक वरिष्ठ अधिकारियों ने इसकी सुध क्यों नहीं ली?
मिलीभगत और भ्रष्टाचार की बू
जानकारों का मानना है कि यह केवल एक तकनीकी चूक या लापरवाही का मामला नहीं है। दो अलग-अलग जिलों के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और सिविल सर्जनों की नाक के नीचे कोई डॉक्टर महीनों तक यह खेल खेलता रहे, यह बिना ऊंचे रसूख और स्थानीय बाबू-अधिकारियों की मिलीभगत के मुमकिन नहीं है। आशंका जताई जा रही है कि इस खेल में कई और सफेदपोश और प्रशासनिक चेहरे शामिल हो सकते हैं।
जांच के घेरे में स्वास्थ्य विभाग
मामला उजागर होने के बाद अब भोपाल से लेकर संबंधित जिलों के प्रशासनिक हल्कों में खलबली मची है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं। संबंधित डॉक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी करने और दोनों जगहों के आहरण-वितरण अधिकारियों (DDO) से जवाब तलब करने की तैयारी की जा रही है।
बड़ा सवाल:
जहां एक तरफ ग्रामीण इलाकों के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, वहीं दूसरी तरफ मुस्तैद डॉक्टरों की कागजी तैनाती कर सरकारी फंड का ऐसा खुला दुरुपयोग सिस्टम की ईमानदारी पर बड़ा तमाचा है। देखना होगा कि इस ‘महाफर्जीवाड़े’ के असली संरक्षकों पर क्या कार्रवाई होती है या हर बार की तरह मामला फाइलों में दबा दिया जाएगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, मझौली दर्पण न्यूज




