2016 में जब Reliance Jio भारतीय टेलीकॉम बाजार में उतरा, तो इसे डिजिटल क्रांति का नाम दिया गया।
नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट
फ्री कॉल, फ्री डेटा और “हर हाथ में इंटरनेट” के नारे के साथ जनता को एक सुनहरा सपना दिखाया गया। शुरुआती दौर में वाकई ऐसा लगा मानो इंटरनेट आम आदमी की पहुंच में आ गया हो। लेकिन वक्त के साथ यह सपना धीरे-धीरे एक महंगी मजबूरी में बदलता चला गया।
पहले आदत, फिर कीमत
शुरुआत में मुफ्त और सस्ते प्लानों ने बाजार की तस्वीर बदल दी। Airtel, Vodafone-Idea जैसी कंपनियां या तो कमजोर पड़ीं या विलय के लिए मजबूर हुईं। प्रतिस्पर्धा कम हुई, और यहीं से असली खेल शुरू हुआ।
₹149 से शुरू हुआ रिचार्ज ₹399, फिर ₹555 और ₹799 तक पहुंच गया। डेटा वही, नेटवर्क वही, लेकिन कीमतें कई गुना। आम उपभोक्ता के पास विकल्प कम होते गए और मजबूरी बढ़ती गई।
लॉकडाउन में भी राहत नहीं
जब लॉकडाउन के दौरान पढ़ाई, नौकरी, इलाज और सरकारी सेवाएं—सब कुछ इंटरनेट पर निर्भर था, उसी समय प्लान फिर महंगे कर दिए गए। 28 दिन की वैधता ने हर महीने रिचार्ज को अनिवार्य बना दिया। ऊपर से ऐड-ऑन, अलग-अलग चार्ज—ग्राहक को पूरी तरह सिस्टम में लॉक कर दिया गया।
सवाल उठता है: जब देश सबसे ज्यादा निर्भर था, तब सबसे ज्यादा वसूली क्यों?
एंट्री-लेवल भी लग्ज़री
2024–25 तक आते-आते हालात और सख्त हो गए। ₹239–₹249 जैसे बेसिक प्लान गायब, शुरुआत सीधे ₹299 से। 1.5GB/दिन को “प्रीमियम अनुभव” बताया जाने लगा।
ग्रामीण, मजदूर, छात्र और कम आय वर्ग के लिए इंटरनेट अब सुविधा नहीं, हर महीने की EMI जैसा बोझ बन गया है।
कॉरपोरेट मुनाफा, जनता पर भार
आलोचकों का कहना है कि यह डिजिटल क्रांती नहीं बल्कि डिजिटल एकाधिकार की कहानी है। पहले बाजार साफ किया गया, फिर मनमानी कीमतें थोपी गईं। इस पूरे मॉडल में फायदा कॉरपोरेट साम्राज्य को हुआ, जबकि आम आदमी हर महीने रिचार्ज के लिए मजबूर होता गया।
बड़ा सवाल
क्या Digital India का मतलब यही था कि इंटरनेट जरूरत बनने के बाद उसे महंगा कर दिया जाए?
क्या सरकार और नियामक संस्थाएं इस बढ़ती वसूली पर सवाल उठाएंगी, या डिजिटल भारत सिर्फ कॉरपोरेट मुनाफे का दूसरा नाम बनकर रह जाएगा?
सच कड़वा है—यह आज़ादी नहीं, मजबूरी बनती जा रही है।
अब देखना यह है कि जनता की आवाज़ सुनी जाती है या डिजिटल गुलामी को ही नया सामान्य मान लिया जाएगा।




