जनता पूछ रही है—यह सुविधा है या सरकारी धन की खुली फिजूलखर्ची?
नई दिल्ली/भोपाल
देश में आम नागरिक आज ₹399–₹449 में अनलिमिटेड कॉल और डेटा वाला मोबाइल रिचार्ज करा लेता है, वहीं जनप्रतिनिधियों को ₹9000 प्रति माह फोन भत्ता दिया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। महंगाई, बेरोजगारी और कटौती के दौर में जब आम आदमी हर खर्च से पहले दस बार सोचने को मजबूर है, तब यह विशेष सुविधा नैतिकता और जवाबदेही के मानकों पर खरी कैसे उतरती है?
प्रश्न सीधा है—जब ₹400 में अनलिमिटेड कॉल संभव है, तो ₹9000 किस आधार पर?
क्या यह राशि वास्तविक जरूरत पर आधारित है या वर्षों पुराने नियमों की देन?
क्या कहता है कानून?
विधायकों/सांसदों को मिलने वाले वेतन और भत्ते विधानसभा/संसद द्वारा बनाए गए अधिनियमों और नियमों के तहत तय होते हैं। तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भत्ता कानूनी है, लेकिन सवाल कानून की मंशा और वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता का है।
जब टेलीकॉम सेक्टर में दरें ऐतिहासिक रूप से नीचे आ चुकी हैं, तब भी भत्तों में संशोधन न होना कानूनी चूक नहीं, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही जरूर मानी जा सकती है।
जनता का पैसा, जनता से जवाब क्यों नहीं?
यह भत्ता सरकारी खजाने, यानी जनता के टैक्स के पैसे से दिया जाता है। ऐसे में पारदर्शिता और तर्कसंगतता अनिवार्य है। यदि विधायक को अतिरिक्त संचार सुविधाएं चाहिए भी, तो उसका स्पष्ट औचित्य, उपयोग विवरण और सीमा तय होनी चाहिए।




