मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में वर्षों से चले आ रहे वेतन भेदभाव के गंभीर मामले पर सख्त रुख अपनाया है।
जबलपुर
ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) और डिस्ट्रिक्ट कम्युनिटी मोबिलाइजर (DCM) के पदों पर समान कार्य करने के बावजूद अलग-अलग वेतन दिए जाने को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने राज्य शासन से सीधा सवाल किया— जब पद और कार्य समान हैं, तो वेतन में विसंगति क्यों?”
कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव, नेशनल हेल्थ मिशन के संचालक, सीएमएचओ जबलपुर सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी अमित चंद्रा सहित नरसिंहपुर, रीवा व अन्य जिलों के कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता शिशिर सोनी ने पक्ष रखते हुए बताया कि वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने BPM और DCM दोनों पदों के लिए एक ही विज्ञापन जारी किया था, जिसमें समान शैक्षणिक योग्यता और अहर्ताएं निर्धारित थीं। प्रारंभ में BPM कर्मियों को DCM से लगभग दो हजार रुपये अधिक वेतन दिया गया, लेकिन वर्ष 2013 से स्थिति उलट गई और BPM को कम वेतन दिया जाने लगा।
याचिका में यह भी बताया गया कि कर्मचारियों ने इस अन्याय के खिलाफ कई बार विभागीय अधिकारियों को अभ्यावेदन सौंपे, लेकिन वर्षों तक कोई सुनवाई नहीं हुई। अंततः मजबूर होकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हाईकोर्ट के इस सवाल के बाद स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब सभी की निगाहें सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जिससे तय होगा कि समान कार्य के लिए समान वेतन का संवैधानिक सिद्धांत वास्तव में लागू होगा या फिर कर्मचारियों को अभी और संघर्ष करना पड़ेगा।




